स्कूली पाठ्यक्रमों में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की अनुपस्थिति पर HRPC का सख्त रुख: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग भारत सरकार से दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी
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आजादी के 77 वर्ष पूरे होने के बावजूद देश के स्कूली पाठ्यक्रमों में “मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993” को शामिल न किया जाना एक गंभीर चिंता का विषय है। यह न केवल शिक्षा प्रणाली की कमियों को उजागर करता है, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की नींव पर प्रश्नचिह्न लगाता है। मानवाधिकार किसी वैकल्पिक सिद्धांत या विषय का हिस्सा नहीं हैं; ये हर नागरिक के जन्मसिद्ध और संवैधानिक अधिकार हैं। स्कूली स्तर पर इनकी शिक्षा का अभाव दर्शाता है कि समाज के बड़े वर्ग तक अधिकारों की जागरूकता व्यवस्थित रूप से नहीं पहुंच पाई है। यदि इस अधिनियम को समय रहते पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया होता, तो प्रत्येक विद्यार्थी बचपन से ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होता, जो एक जिम्मेदार नागरिकता और संवेदनशील समाज की आधारशिला बन सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकारों के साथ कर्तव्य और नैतिक मूल्यों का समावेश प्रारंभिक शिक्षा में होने से लोकतंत्र और मजबूत होता है।
ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन सेल (HRPC) इस मुद्दे पर लंबे समय से सक्रिय है और अपनी मांगों को लेकर निरंतर प्रयासरत रहा है। HRPC ने बार-बार जोर दिया है कि कक्षा 9वीं से 12वीं तक के पाठ्यक्रम में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, ताकि किशोरावस्था से ही विद्यार्थी कानून, अधिकार, न्याय और मानव गरिमा की अवधारणाओं से परिचित हो सकें। निर्धारित समयसीमा में कार्यवाही न होने पर HRPC ने सख्त रुख अपनाया और इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप, केस नंबर 586/90/0/2025 में HRPC को पक्षकार बनाते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कानून विभाग ने 31 दिसंबर 2025 को स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग भारत सरकार को निर्देश जारी किए कि वह दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे। यह आदेश मुद्दे की गंभीरता को संस्थागत मान्यता प्रदान करता है। HRPC का स्पष्ट मत है कि इस अधिनियम को पाठ्यक्रम में शामिल करना केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की चेतना और संवेदनशीलता के निर्माण का महत्वपूर्ण कदम है।
मानवाधिकार शिक्षा की अनिवार्यता केवल सूचना प्रदान करने तक सीमित नहीं है; यह बच्चों और युवाओं में समानता, सहिष्णुता, सम्मान, कानून के शासन और सामाजिक न्याय के प्रति गहरा विश्वास विकसित करती है। यदि नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों से जागरूक होते, तो महिला उत्पीड़न, मानव तस्करी, भ्रष्टाचार, शासकीय मशीनरी का दुरुपयोग, जातिवाद, लिंगभेद, बालश्रम, पर्यावरण प्रदूषण तथा न्याय और समान शिक्षा के अभाव जैसे मुद्दों में उल्लेखनीय कमी आ सकती थी। अधिकारों की जानकारी का अभाव अक्सर शोषण और अन्याय का मुख्य कारण बनता है। जागरूक नागरिक न केवल अपने अधिकारों की रक्षा करते हैं, बल्कि दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान सुनिश्चित करते हैं, जिससे समाज में संतुलन और सद्भाव की वृद्धि होती है।
शिक्षा तंत्र की भूमिका केवल तकनीकी या रोजगारोन्मुख ज्ञान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; इसे संवैधानिक मूल्यों, मानव गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व की समझ भी प्रदान करनी चाहिए। आधुनिक भारत को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो वैज्ञानिक प्रगति, आर्थिक विकास और तकनीकी उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्यों को भी महत्व दें। स्कूल शिक्षा वह प्राथमिक मंच है जहां बच्चे अधिकार, कर्तव्य, समानता, न्याय, लैंगिक संवेदनशीलता और सामाजिक मर्यादाओं के बारे में औपचारिक रूप से सीख सकते हैं। HRPC का जोर इसी बात पर है कि मानवाधिकार शिक्षा को वैकल्पिक न रखकर अनिवार्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
HRPC का संघर्ष केवल संस्थागत निर्णयों तक नहीं रुका है; यह अब सामाजिक चेतना के व्यापक आंदोलन का रूप ले चुका है। HRPC का विश्वास है कि अधिकारों से जागरूक पीढ़ी ही राष्ट्र को मजबूत, विकसित और मानवीय दिशा में आगे ले जा सकती है। यह लड़ाई दस्तावेजों या अधिसूचनाओं से परे हर नागरिक की गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए है। HRPC का मत है कि यदि आज नागरिक अपने अधिकारों से पूर्णतः परिचित होते, तो वे गलत नीतियों, शोषण, अन्याय और दुरुपयोग के विरुद्ध स्वयं आवाज उठा सकते थे। मानवाधिकार शिक्षा व्यक्ति को न केवल अधिकारों का ज्ञान देती है, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक बनाती है, जो किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
HRPC के सतत प्रयास मानवता, सामाजिक न्याय और सभ्य समाज के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हो रहे हैं। जिस दिन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 को स्कूली पाठ्यक्रमों का औपचारिक हिस्सा बना लिया जाएगा, वह न केवल HRPC की विजय होगी, बल्कि पूरे राष्ट्र की नैतिक और संवैधानिक चेतना की सफलता होगी। आने वाली पीढ़ियां सभ्य समाज निर्माण के लिए HRPC के संघर्ष को इतिहास के पन्नों में अवश्य पढ़ेंगी।
