खनन के नाम पर विस्थापन स्वीकार्य नहीं आदिवासी अधिकारों की रक्षा हेतु HRPC ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखा पत्र सिरोही खनन परियोजना को तत्काल रद्द करने की रखी मांग
Newsनई दिल्ली, दिनांक 24 जनवरी 2026: आदिवासी बहुल क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं के नाम पर जो कुछ आज देश के विभिन्न हिस्सों में घटित हो रहा है, वह केवल “विकास” का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह संविधान, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा है। राजस्थान के जिला सिरोही अंतर्गत पिण्डवाड़ा तहसील के ग्राम पंचायत वाटेश, भीमाना, भारजा एवं रोहिड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित कमलेश मेटाकास्ट खनन परियोजना ने इसी संवैधानिक संकट को उजागर कर दिया है। इस प्रकरण में आदिवासी, दलित, पशुपालक एवं किसान समुदायों के निवास, आजीविका, पर्यावरण, अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण विरोध एवं न्याय तक पहुँच जैसे मूल अधिकारों का एक साथ हनन किया गया है।
यह मामला HRPC ट्राइबल सेल, राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष श्री सुरेश राजपुरोहित द्वारा जब राष्ट्रीय कार्यालय, नई दिल्ली के संज्ञान में लाया गया, तब यह स्पष्ट हुआ कि प्रशासनिक कार्रवाई केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव एवं कॉर्पोरेट हितों से प्रेरित प्रतीत होती है। अनुसूचित जनजाति के लगभग 37 परिवार, जो पीढ़ियों से अपनी भूमि पर निवासरत हैं, उन्हें अचानक “अतिक्रमणकारी” घोषित कर राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धाराओं के अंतर्गत नोटिस जारी करना, भारी जुर्माने व कारावास की धमकी देना, न केवल अमानवीय है बल्कि अनुच्छेद 21 में निहित गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार पर सीधा प्रहार है।
विगत चार महीनों से जब क्षेत्रवासी शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक दायरे में रहकर विरोध दर्ज करा रहे हैं, तब उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के अंतर्गत सामूहिक नोटिस जारी कर भय और दहशत का वातावरण बनाया गया। यह स्थिति बताती है कि राज्य शक्ति का प्रयोग नागरिकों की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनकी आवाज़ दबाने के लिए किया जा रहा है। यह अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) एवं अनुच्छेद 14 के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
स्थिति तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब पत्रकार श्री तुषार पुरोहित को मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रम का कवरेज करने से और अधिवक्ता श्री हार्दिक रावल को न्यायालय में पैरवी करने से पुलिस द्वारा बिना किसी लिखित आदेश के रोका जाता है। यह केवल व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह प्रेस की स्वतंत्रता और न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता पर हमला है। लोकतंत्र में जब पत्रकार और अधिवक्ता रोके जाने लगें, तब यह संकेत होता है कि सत्ता जवाबदेही से बचना चाहती है।
मामले की गंभीरता को समझते हुए HRPC राष्ट्रीय कार्यालय, नई दिल्ली ने इसे केवल एक राज्य स्तरीय विषय न मानकर राष्ट्रीय मानवाधिकार संकट के रूप में लिया। प्रसिद्ध अधिवक्ता श्री नवीन कुमार शेलर तथा श्री सुनील कुमार गुप्ता (अधिवक्ता एवं पूर्व कानूनी सलाहकार, तिहाड़ जेल, दिल्ली) के मार्गदर्शन में एक विस्तृत ऑनलाइन विधिक बैठक आयोजित की गई, जिसमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के HRPC पदाधिकारियों ने भाग लेकर सभी संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक पहलुओं का गहन विश्लेषण किया।
इस विचार-विमर्श के उपरांत दिनांक 24 जनवरी 2026 को HRPC राष्ट्रीय कार्यालय द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत में स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया गया कि आदिवासी क्षेत्रों में बिना ग्राम सभा की स्वतंत्र सहमति, पुनर्वास नीति, पर्यावरणीय आकलन और आजीविका सुरक्षा के किसी भी खनन परियोजना को लागू करना असंवैधानिक है तथा इससे सामाजिक अशांति एवं उग्र आंदोलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसकी जिम्मेदारी पूर्णतः राज्य प्रशासन की होगी।
HRPC का यह हस्तक्षेप केवल एक प्रकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि मानवाधिकारों के प्रश्न पर संगठन मौन नहीं रहेगा। यदि विकास की अवधारणा मनुष्य, प्रकृति और संविधान को कुचलकर आगे बढ़े, तो वह विकास नहीं बल्कि विनाश है। HRPC यह स्पष्ट करता है कि आदिवासी, दलित एवं वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा हेतु वह हर संवैधानिक मंच पर, हर आवश्यक कानूनी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।
